Save Aravalli: देश की सबसे प्राचीन और पर्यावरणीय रूप से सबसे अहम पर्वतमालाओं में शामिल अरावली एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। हालिया सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उठे सवाल, बढ़ती जन-चिंता और विशेषज्ञों की चेतावनियों के बीच अब इस मामले में दोबारा सुनवाई की मांग तेज हो गई है।
पर्यावरण संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और राष्ट्रपति को पत्र लिखे जाने के बाद यह मुद्दा सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि जनहित और भविष्य से जुड़ा राष्ट्रीय प्रश्न बन चुका है।
आज के परिप्रेक्ष्य में यह विवाद इसलिए भी अहम है, क्योंकि देश भीषण गर्मी, वायु प्रदूषण और जल संकट जैसी समस्याओं से जूझ रहा है—और अरावली को इन सभी चुनौतियों के खिलाफ प्राकृतिक ढाल माना जाता है।
क्या है हालिया सुप्रीम कोर्ट फैसला?
हाल ही में ने अरावली क्षेत्र को लेकर केंद्र सरकार की परिभाषा को स्वीकार करते हुए कहा कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को स्वतः ‘वन क्षेत्र’ नहीं माना जाएगा।
इस फैसले को प्रशासनिक स्पष्टता की दिशा में एक कदम बताया गया, लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि इससे खनन, निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है, जो अरावली के अस्तित्व के लिए खतरा है।
दिल्ली-NCR समेत उत्तर भारत के कई हिस्सों में पहले से ही खराब वायु गुणवत्ता और गिरते भूजल स्तर के बीच यह फैसला पर्यावरणीय असंतुलन को और गहरा कर सकता है।
CJI और राष्ट्रपति को पत्र: क्यों बढ़ी चिंता?
पर्यावरण कार्यकर्ताओं द्वारा भेजे गए पत्र में साफ कहा गया है कि अरावली केवल पहाड़ियों की श्रृंखला नहीं, बल्कि:
- उत्तर भारत की जलवायु संतुलन प्रणाली का आधार
- भूजल रिचार्ज का प्रमुख स्रोत
- दिल्ली-NCR के लिए प्राकृतिक एयर-फिल्टर
पत्र में यह भी चेतावनी दी गई है कि मौजूदा फैसले के दीर्घकालिक प्रभाव देश के पर्यावरण कानूनों की मूल भावना को कमजोर कर सकते हैं। इसी आधार पर इस मामले को संवैधानिक पीठ के समक्ष दोबारा सुनवाई के लिए लाने की मांग की गई है।
क्या सुप्रीम कोर्ट में दोबारा सुनवाई संभव है?
कानूनी जानकारों के मुताबिक, यदि यह साबित होता है कि फैसले से सार्वजनिक हित और पर्यावरण संरक्षण को गंभीर नुकसान हो सकता है, तो रिव्यू पिटीशन के जरिए सुप्रीम कोर्ट के पास मामले पर पुनर्विचार करने का विकल्प मौजूद है।
हालांकि, अंतिम फैसला अदालत के विवेक और प्रस्तुत किए गए ठोस तथ्यों पर निर्भर करेगा।
पब्लिक रिएक्शन: ‘अरावली नहीं बची तो शहर नहीं बचेंगे’
अरावली मुद्दे पर आम जनता की प्रतिक्रिया लगातार तेज होती जा रही है। दिल्ली, गुरुग्राम, फरीदाबाद और राजस्थान-हरियाणा के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोग इसे अपने स्वास्थ्य और भविष्य से जुड़ा सवाल बता रहे हैं।
सोशल मीडिया पर #SaveAravalli, #AravalliRow और #ProtectGreenIndia जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं।
एक दिल्लीवासी ने लिखा,
“अरावली कमजोर हुई तो दिल्ली में सांस लेना और मुश्किल हो जाएगा। यह पहाड़ नहीं, हमारी सुरक्षा कवच है।”
गुरुग्राम के एक स्थानीय निवासी का कहना है,
“हर साल बढ़ती गर्मी और पानी की किल्लत झेल रहे हैं। ऐसे में अरावली से छेड़छाड़ आम लोगों के लिए सीधा खतरा है।”
एक्सपर्ट कोट्स: विशेषज्ञों की सीधी चेतावनी
पर्यावरण वैज्ञानिकों का मानना है कि अरावली को कमजोर करने से:
- रेगिस्तानीकरण तेज होगा
- हीटवेव की तीव्रता बढ़ेगी
- जैव विविधता और वन्यजीवों को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी
एक वरिष्ठ पर्यावरण विशेषज्ञ के अनुसार,
“अरावली उत्तर भारत की जलवायु प्रणाली की रीढ़ है। इसे नुकसान पहुंचाना आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय होगा।”
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि,
“यदि यह साबित हो जाए कि फैसले से पर्यावरणीय संतुलन और सार्वजनिक हित प्रभावित हो रहा है, तो दोबारा सुनवाई पर विचार कर सकता है।”
वहीं जल और शहरी नियोजन विशेषज्ञों ने चेताया है कि अरावली पर दबाव बढ़ने से जल संकट, शहरी बाढ़ और प्रदूषण की समस्याएं और गंभीर होंगी।
विकास बनाम पर्यावरण: संतुलन की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि विकास जरूरी है, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर विकास टिकाऊ नहीं हो सकता। अरावली को लेकर लिया गया हर फैसला आने वाले दशकों तक देश की जलवायु और जीवन-स्तर को प्रभावित करेगा।
फैसला जो भविष्य तय करेगा
अरावली विवाद अब सिर्फ अदालत की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहा। जनता की चिंता, विशेषज्ञों की चेतावनी और पर्यावरणीय वास्तविकताएं यह संकेत दे रही हैं कि इस मुद्दे पर संवेदनशील, संतुलित और दूरदर्शी फैसला जरूरी है।
अब देश की निगाहें इस सवाल पर टिकी हैं—
क्या सुप्रीम कोर्ट इस बढ़ते दबाव को देखते हुए अरावली मामले पर दोबारा सुनवाई करेगा, या यह विवाद आने वाले समय में और गहराएगा?

